एक वैश्विक शक्ति के रूप में भारत का उदय: मलेशिया के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

भारत का उदय चीन की संरचनात्मक आर्थिक सुस्ती के साथ-साथ हो रहा है, जिससे एशिया का रणनीतिक परिदृश्य नए सिरे से आकार ले रहा है। मलेशिया के लिए विकल्प भारत और किसी अन्य देश के बीच नहीं है, बल्कि इस बात के बीच है कि वह भारत के उभार के लिए समय रहते तैयारी करे या फिर देर से अपने को ढाले। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा एक रणनीतिक मोड़ का प्रतिनिधित्व करती है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में संबंधों को गहरा करना केवल विवेकपूर्ण कदम नहीं है—बल्कि यह मलेशिया की दीर्घकालिक समृद्धि, सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की बुनियाद है।

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Prime Minister Narendra Modi visit to Malaysia

लंबे समय तक भारत की शक्ति, प्रभाव और क्षेत्रीय तथा वैश्विक आर्थिक नेतृत्व को आकार देने में उसकी भूमिका को कम करके आंका गया। आज, एक वैश्विक आर्थिक शक्ति और हिंद–प्रशांत क्षेत्र में निर्णायक संतुलनकारी शक्ति के रूप में भारत का उभरना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है—खासकर ऐसे समय में, जब चीन आर्थिक मंदी और रणनीतिक तनाव के एक लंबे दौर में प्रवेश कर रहा है।

मलेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत का परिवर्तन कोई सैद्धांतिक या दूर की बात नहीं है। भारत अब उनके भविष्य के आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों के केंद्र में आ चुका है—आर्थिक लचीलापन, सुरक्षा सहयोग, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी तक पहुंच तथा रणनीतिक विकल्प प्रदान करने के माध्यम से वह स्थिरता का एक प्रमुख स्तंभ बन गया है।

इसी कारण 7–8 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशिया यात्रा दोनों देशों के लिए—विशेषकर मलेशिया के लिए—रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कुआलालंपुर के लिए पारंपरिक संतुलन-नीति से आगे बढ़कर आने वाले दशकों के लिए भारत को एक प्रथम-स्तरीय रणनीतिक साझेदार के रूप में स्वीकार करने का अवसर है।

भारत की आर्थिक दृढ़ता

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार, भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जिसकी वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है—जबकि अधिकांश विकसित और बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं 3 प्रतिशत की दर को भी पार करने में संघर्ष कर रही हैं।

भारत की नाममात्र जीडीपी 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर चुकी है। आईएमएफ और विश्व बैंक के मध्यम-अवधि अनुमानों के अनुसार, वह इस दशक में जापान और जर्मनी से आगे निकल सकता है और 2040 के दशक तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता रखता है। इस प्रगति के पीछे ठोस उपलब्धियां हैं—विशाल और विस्तारशील घरेलू बाजार, मजबूत जनसांख्यिकीय लाभ, लगातार पूंजीगत व्यय, बढ़ता विनिर्माण उत्पादन और उपभोग-आधारित विकास से निवेश व उत्पादकता-आधारित विकास की ओर निर्णायक बदलाव।

पिछले एक दशक में, विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत ने ऐसे संरचनात्मक सुधार लागू किए हैं जिन्हें बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अक्सर लागू नहीं कर पातीं—जैसे देशव्यापी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), एकीकृत दिवालियापन ढांचा, डिजिटल सार्वजनिक वित्त प्रणाली और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा निवेश। इन सुधारों से शासन क्षमता मजबूत हुई है, लेन-देन लागत घटी है और पूंजी आवंटन बेहतर हुआ है।

जनसांख्यिकी भारत की स्थायी बढ़त बनी हुई है—खासकर चीन की तुलना में। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के साथ, जहां औसत आयु 30 वर्ष से कम है, भारत की श्रम-शक्ति 2040 के दशक तक लगातार बढ़ती रहेगी। यह मानव संसाधन आधार विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों को मजबूती देता है और घरेलू उपभोग को भी सहारा देता है।

इसके विपरीत, चीन तेज़ी से वृद्ध होता जा रहा है। कार्यशील आयु की आबादी में कमी और निर्भरता अनुपात में वृद्धि से उत्पादकता वृद्धि बाधित हो रही है। जनसांख्यिकी किसी देश की शक्ति की ऊपरी सीमा तय करती है—और जहां भारत की सीमा लगातार ऊपर जा रही है, वहीं चीन की सीमा स्थिर होती दिख रही है।

2026 की शक्ति-संतुलन वास्तविकता यह है कि चीन अब भी प्रभावशाली है, लेकिन वह संरचनात्मक मंदी, ऊंचे ऋण स्तर, कमजोर रियल-एस्टेट बाजार और तेज़ जनसांख्यिकीय गिरावट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। विश्व बैंक के अनुसार, चीन की वृद्धि दर 2025 में 4.9 प्रतिशत से घटकर 2027 तक 4.2 प्रतिशत रह सकती है, जिससे वैश्विक वृद्धि में उसका सीमांत योगदान कम होगा।

इस पृष्ठभूमि में, भारत का उभार केवल आर्थिक कहानी नहीं है—यह एक ठोस शक्ति-राजनीतिक वास्तविकता है, जो बिना टकराव के एक संतुलन प्रदान करती है।

क्षेत्रीय अवसर

प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक्ट ईस्ट नीति’, जिसे 2014 में शुरू किया गया था, ने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया की सुरक्षा और समृद्धि में दीर्घकालिक हित रखने वाली एक स्थायी हिंद–प्रशांत शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एकीकरण, संपर्क और सुरक्षा सहयोग को गहरा कर इस नीति ने क्षेत्रीय लचीलापन बढ़ाया है और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच एक स्थिर संतुलन प्रदान किया है।

‘एक्ट ईस्ट’ ने अंडमान सागर से मलक्का जलडमरूमध्य तक समुद्री क्षेत्र पर रणनीतिक ध्यान फिर से केंद्रित किया है—जहां भारत की मौजूदगी क्षेत्र को बढ़ते तनावों के बीच आश्वस्त करती है।

इसके साथ-साथ ‘मेक इन इंडिया’ पहल भारत की आर्थिक केंद्रीयता को और मजबूत करती है। ये दोनों नीतियां मिलकर भारत को एक साथ विनिर्माण साझेदार, बाज़ार और सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित करती हैं। ‘मेक इन इंडिया’ ने सेवाओं और उपभोग से आगे बढ़कर उत्पादन क्षमता को पुनर्जीवित किया है और विनिर्माण व औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया है। दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए इससे वैकल्पिक उत्पादन केंद्र और अधिक लचीली आपूर्ति शृंखलाएं बनती हैं।

‘डिजिटल इंडिया’ के तहत भारत का डिजिटल परिवर्तन इस गति को और सशक्त करता है। दुनिया की सबसे विस्तारशील डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में भारत ने लेन-देन लागत कम की है, वित्तीय समावेशन बढ़ाया है, छोटे व्यवसायों को सशक्त किया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, फिनटेक तथा डिजिटल शासन की नींव रखी है।

मलेशिया और आसियान देशों के लिए भारत का डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र कम लागत वाले समावेशन के मॉडल और फिनटेक, साइबर सुरक्षा तथा डिजिटल व्यापार अवसंरचना में अवसर प्रदान करता है।

भारत में अब 2 लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्ट-अप हैं—जो फिनटेक, हेल्थटेक, रक्षा प्रौद्योगिकी, एआई और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं—और यह इसे दुनिया के सबसे बड़े नवाचार पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक बनाता है। रणनीतिक क्षेत्रों, विशेषकर सेमीकंडक्टर, पर भारत का नया जोर मलेशिया के साथ मजबूत पूरकता बनाता है, जो पहले से ही वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला का एक अहम केंद्र है। मलेशिया को उन्नत पैकेजिंग, परीक्षण, चिप डिजाइन पारिस्थितिकी तंत्र और एआई-सक्षम विनिर्माण में लाभ मिल सकता है।

यह साझेदारी दोहराव वाली नहीं है—भारत पैमाना और मांग लाता है, जबकि मलेशिया एकीकरण और विनिर्माण की गहराई प्रदान करता है।

भारत का ऊर्जा संक्रमण भी नए अवसर खोलता है। नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, हरित हाइड्रोजन और ग्रिड आधुनिकीकरण के लिए भारत भविष्य के सबसे बड़े बाजारों में से एक होगा। इससे संयुक्त निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण के अवसर बनते हैं—जो मलेशिया के अपने ऊर्जा और डिजिटल संक्रमण के साथ पूरक हैं।

खाद्य सुरक्षा भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देती है। 2024 में, निर्यात प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने मलेशिया को गैर-बासमती चावल के 2 लाख मीट्रिक टन के एकमुश्त निर्यात को मंजूरी दी—जो आपूर्ति शृंखला संकट के समय एक स्थिर भागीदार के रूप में उसकी भूमिका को दर्शाता है।

व्यापार और जन-स्तरीय संबंध

पिछले एक दशक में द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना होकर 19–20 अरब अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष तक पहुंच गया है। मलेशिया अब भारत के शीर्ष आसियान व्यापार साझेदारों में से एक है, जबकि भारत दक्षिण एशिया में मलेशिया का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार है।

मलेशिया इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, पाम ऑयल, रसायन और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात करता है, जबकि भारत परिष्कृत पेट्रोलियम, दवाएं, मशीनरी, इस्पात, खाद्य उत्पाद और आईटी-सक्षम सेवाएं प्रदान करता है। भारत मलेशियाई पाम ऑयल के सबसे बड़े आयातकों में से एक बना हुआ है, जिससे एक स्थिर बाजार मिलता है, वहीं भारतीय दवाओं ने मलेशिया की स्वास्थ्य प्रणाली में लागत वहन-क्षमता और लचीलापन बढ़ाया है।

जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था 2030 तक 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की ओर बढ़ेगी और उसका मध्यम वर्ग करोड़ों लोगों से विस्तारित होगा, मलेशिया को इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल व्यापार, ऊर्जा और कृषि-उत्पादों में बड़ा लाभ मिल सकता है—जिससे भारत-मलेशिया गलियारा दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सबसे गतिशील संपर्कों में से एक बन सकता है।

जन-स्तरीय संबंध इस साझेदारी को और मजबूत करते हैं। शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैज्ञानिक सहयोग एक गहरी सामाजिक नींव तैयार करते हैं। भारतीय विश्वविद्यालय लंबे समय से मलेशियाई छात्रों को चिकित्सा, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित करते आए हैं, जिससे मजबूत पूर्व-छात्र नेटवर्क बना है। अब विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) तथा नवाचार में भारत की बढ़ती क्षमता प्रतिभा विनिमय और ज्ञान साझेदारी को और गहरा कर रही है।

सुरक्षा के क्षेत्र में, भारत की विस्तारित सैन्य क्षमताओं ने उसे हिंद–प्रशांत में एक विश्वसनीय बहु-क्षेत्रीय प्रतिरोधक शक्ति बना दिया है। दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश होने के नाते, ब्लू-वॉटर नौसेना, उन्नत वायुसेना और निरंतर क्षेत्रीय तैनातियों के साथ, भारत समुद्री सुरक्षा और उन समुद्री मार्गों की रक्षा में सीधे योगदान देता है जो मलेशिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

‘हरिमाउ शक्ति’ जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास आपसी संचालन-क्षमता और विश्वास को बढ़ाते हैं, समुद्री क्षेत्र की निगरानी को सुदृढ़ करते हैं और बढ़ते ‘ग्रे-ज़ोन’ दबावों के बीच टकराव के जोखिम को कम करते हैं।

एशिया का पुनर्गठन

भारत का उदय चीन की संरचनात्मक आर्थिक मंदी के साथ-साथ हो रहा है, जिससे एशिया का रणनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। मलेशिया के लिए विकल्प भारत और अन्य देशों के बीच नहीं है, बल्कि समय रहते भारत के उभार के लिए तैयारी करने और देर से अनुकूलन करने के बीच है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा एक रणनीतिक मोड़ का प्रतीक है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और संस्कृति में सहयोग को गहरा करना केवल समझदारी नहीं है—यह मलेशिया की दीर्घकालिक समृद्धि, सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की आधारशिला है।

(लेखक कुआलालंपुर स्थित रणनीतिक और सुरक्षा विश्लेषक हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। उनसे संपर्क किया जा सकता है: collins@um.edu.my)

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