सोमनाथ मंदिर: इतिहास का राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल

इतिहास हमें यह दिखाने के लिए है कि अतीत में कौन-कौन सी गलतियाँ हुईं, ताकि वे फिर न दोहराई जाएँ। हमें एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ना चाहिए जहाँ सभी सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जिएँ—एक ऐसा समाज जहाँ हम सभी समान नागरिक अधिकारों का आनंद लें।

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Somnath temple

राम मंदिर के इर्द-गिर्द चलाया गया अभियान—अर्थात बाबरी मस्जिद का ध्वंस—ने भाजपा और उसकी मातृ संस्था आरएसएस को भारी चुनावी लाभ पहुँचाया। काशी और मथुरा इस कतार में हैं। अब ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के साथ एक नया मोर्चा खोल दिया गया है। इस अवसर पर पूर्ण धार्मिक वेश में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बातें कहीं—एक प्रत्यक्ष और दूसरी परोक्ष। पहली, कि सोमनाथ मंदिर भारत की गौरव-गाथा का प्रतीक था और मुस्लिम शासकों ने उस पर बार-बार आक्रमण किया—महमूद ग़ज़नी ने 1026 में इसे ध्वस्त किया और 17 बार लूटा—लेकिन यह हर बार और अधिक वैभव के साथ पुनः खड़ा हुआ। दूसरी बात उन्होंने कांग्रेस पार्टी, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध कही—जिन्हें मोदी नापसंद करते हैं—कि वे इसके पुनर्निर्माण के विरोधी थे।

यह संदेहास्पद है कि कोई भी पूजा-स्थल किसी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का प्रतीक हो सकता है। धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसके नैतिक मूल्य हैं—जैसा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमें सिखाया।

धन के लिए लूट

जहाँ तक महमूद ग़ज़नी का प्रश्न है, उसने वास्तव में सोमनाथ को लूटा। उसके दरबारी इतिहासकारों ने इसे धार्मिक कारणों से किया गया बताया, क्योंकि इस्लाम में मूर्ति-पूजा की अनुमति नहीं है। फ़ारसी स्रोत अल-उतबी और अल-बिरूनी ने सोमनाथ को “ख़ज़ाने का घर” कहा है।

महमूद ग़ज़नी के सोमनाथ पर आक्रमण के पीछे अनेक उद्देश्य हो सकते थे, लेकिन प्रमुख उद्देश्य धन था; यह भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक था। रोमिला थापर ( History of Ancient India, पेंगुइन) के अनुसार, इसके पास 20,000 स्वर्ण दीनार (सिक्कों) के बराबर संपत्ति थी। इस बात के कोई निर्णायक प्रमाण नहीं हैं कि उसने 17 बार लूट की; यह एक लोकप्रिय मिथक है। जो धन उसने लूटा, उसे अनेक हाथियों पर लादकर ग़ज़नी ले जाया गया। तारिख़-ए-बैयकी के अनुसार, महमूद की सेना में तिलक, सोंधी, हरज़ान और हिंद जैसे कई हिंदू सेनापति भी थे। महमूद के उत्तराधिकारी मसूद ने अपने सेनापति तिलक के नेतृत्व में मध्य एशिया में एक मस्जिद से धन लूटने के लिए सेना भेजी।

सोमनाथ से प्रस्थान करते समय ग़ज़नी ने एक स्थानीय हिंदू राजा को अपना गवर्नर नियुक्त किया। उसने संस्कृत शब्दों वाले सिक्के भी जारी किए। इतना ही नहीं, थानेश्वर के राजा आनंदपाल ने हाथी और सैनिक भेजकर उसकी सहायता भी की।

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिरों का ध्वंस मुख्यतः धार्मिक घटना नहीं था। रिचर्ड ईटन ने पूर्व-मुग़ल भारत में मंदिर-ध्वंस पर अपने शोध में बताया है कि दो हिंदू राजाओं के युद्ध में विजयी राजा पराजित राजा के ‘कुलदेवता’ की मूर्ति तोड़कर वहाँ अपने ‘कुलदेवता’ की स्थापना करता था। अलाउद्दीन खिलजी और मुल्तान के अब्दुल फ़तह दाऊद के बीच संघर्ष में एक मस्जिद भी नष्ट की गई। राजाओं के साथ धर्म को जोड़ने की परंपरा ब्रिटिश शासन में शुरू हुई, जब ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत साम्प्रदायिक इतिहास-लेखन को बढ़ावा दिया गया। जेम्स मिल की History of India से लेकर इलियट और डॉसन की बहु-खंडीय History of India as Told by Her Historians तक, राजाओं के शासन का केंद्रीय पैमाना धर्म बना दिया गया।

सत्य और कल्पना

मोदी की राजनीति एक नया विभाजनकारी मोर्चा खोल रही है और नेहरू को भी इस कथा में जोड़ने की कोशिश कर रही है। वे यह दिखा रहे हैं मानो नेहरू सोमनाथ के पुनर्निर्माण के विरोधी थे—यह गलत है। यह मुद्दा तब उठा था जब गांधी जीवित थे, और उन्होंने स्पष्ट कहा था कि मंदिर निर्माण के लिए सरकारी धन का उपयोग नहीं होना चाहिए। कुछ वर्ष पहले जब राम मंदिर की योजना बनी, तब सर्वोच्च न्यायालय ने भी यही राय दी थी। गांधी, नेहरू और पटेल—तीनों इस विषय पर एकमत थे। 28 नवंबर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा था कि जूनागढ़ (जहाँ सोमनाथ स्थित है) की सरकार मंदिर निर्माण के लिए कोई सरकारी धन नहीं दे सकती।

गांधी ने सरदार पटेल से पूछा कि क्या सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए कोई धन दिया जा रहा है। पटेल ने उत्तर दिया कि जब तक मैं जीवित हूँ, ऐसा नहीं होगा और पुनर्निर्माण के लिए दान जनता से एकत्र किया जाएगा। इसी के अनुसार एक ट्रस्ट बनाया गया, जिसके अध्यक्ष सरदार पटेल थे और के.एम. मुंशी व गाडगिल इसके ट्रस्टी थे; इसी ट्रस्ट ने मंदिर निर्माण का कार्य पूरा किया।

झूठा प्रचार यहीं नहीं रुकता। फिर मंदिर के उद्घाटन का प्रश्न आता है। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया और उन्होंने नेहरू से इस बारे में पूछा। 2 मार्च 1951 को नेहरू को लिखे पत्र में प्रसाद ने कहा कि वे व्यक्तिगत हैसियत से उद्घाटन के लिए जाना चाहते हैं। नेहरू ने कहा कि यदि वे इस रूप में जाना चाहते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

बाबेले ने प्रमाणों के आधार पर पूरी सच्चाई स्पष्ट की है। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि राम मंदिर से जुड़े आयोजनों में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को क्यों नहीं बुलाया गया। स्पष्ट है कि राम मंदिर के शिलान्यास और उद्घाटन में इन दोनों राष्ट्रपतियों को इसलिए आमंत्रित नहीं किया गया क्योंकि एक दलित थे और दूसरी आदिवासी!

इतिहास का प्रतिशोध

इतिहास पर एक पूरक टिप्पणी में, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने दिल्ली में एक युवा महोत्सव के उद्घाटन के अवसर पर एक अत्यंत प्रतिगामी सलाह दी। उनके अनुसार हमारे मंदिर लूटे गए, हमारे गाँव उजाड़े गए, इसलिए अब बदला लेने का समय है। प्रश्न यह है कि क्या बदला आधुनिक कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है? यह तो मध्ययुगीन सोच है। हर अपराध के लिए दोषियों को दंड मिलना चाहिए और निर्दोषों को संरक्षण। जिन कथित अपराधों की वे बात कर रहे हैं, उनके लिए बदला किससे लिया जाए? मुस्लिम और हिंदू राजाओं द्वारा मंदिरों के ध्वंस के लिए किससे प्रतिशोध लिया जाए?

इतिहास में ऐसे अत्याचार भी हुए जिनका उन्होंने उल्लेख नहीं किया—बौद्ध विहार नष्ट किए गए; जैन मंदिर तोड़े गए; दलितों और महिलाओं पर अत्याचार सामान्य थे। सती प्रथा थी, जिसमें महिलाओं को पति की चिता पर जीवित जला दिया जाता था। इतिहास के इन अंधे कृत्यों के लिए बदला कौन ले?

इतिहास समाज को बाँटने या अतीत के अन्याय को बनाए रखने का औज़ार नहीं है।
वह हमें यह दिखाने के लिए है कि अतीत में कौन-कौन सी गलतियाँ हुईं, ताकि वे फिर न हों। हमें एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ना है जहाँ सभी सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जिएँ, और जहाँ हम सभी समान नागरिक अधिकारों का आनंद लें।

(लेखक आईआईटी बॉम्बे के पूर्व प्रोफेसर तथा मुंबई स्थित ‘सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म’ के अध्यक्ष हैं। व्यक्त विचार निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे ‘साउथ एशिया मॉनिटर’ के विचारों का प्रतिनिधित्व करें।)

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