भारत की विदेश नीति 2025 में: सिमटते विकल्प और कठिन फैसले

कुल मिलाकर, 2025 भारत की विदेश नीति के लिए एक कठिन वर्ष रहा, जिसमें विकल्प सीमित होते चले गए और वर्ष के अंत तक भारत की विदेश नीति एक बार फिर बाध्यताओं, अवसरों और विकल्पों से अधिक संचालित होती हुई दिखाई दी।

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2025 संभवतः भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) के लिए सबसे कठिन वर्षों में से एक रहा, जब कई घटनाएँ, प्रक्रियाएँ और विमर्श प्रबंधनीय नियंत्रण से बाहर होते चले गए। वर्ष की शुरुआत भारत ने अपेक्षाकृत सहजता और मित्रताओं की भावना के साथ की थी, लेकिन वर्ष के अंत तक भारत का वैश्विक दृष्टिकोण शुरुआत की तुलना में कहीं अधिक निराशावादी दिखाई देता है।

2025 में वैश्विक व्यवस्था में ही एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला, जब प्रत्येक देश अधिक आत्मकेंद्रित और, कहा जाए तो, स्वार्थी होता गया। उदारवादी पक्ष में भी ऐसा प्रतीत होता है कि अब कोई ‘व्यवस्था’ की अवधारणा पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहा। इसके विपरीत, चीन ऐसा देश बनकर उभरा है जो यह तय करने का प्रमुख विचारक लगता है कि वैश्विक व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, क्योंकि वह एक संशोधनवादी शक्ति है और अब अपनी महान शक्ति बनने की महत्वाकांक्षाओं को छिपा भी नहीं रहा है।

भारत की विदेश नीति के सामने तीन स्थायी चुनौतियाँ ऐतिहासिक रूप से बनी रही हैं—संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान और चीन। ये तीनों ही यह निर्धारित करते रहे हैं कि भारत दुनिया को किस तरह देखता है और 2025 में ये तीनों एक साथ सक्रिय होते हुए दिखाई दिए। नीचे चर्चा किए गए तीन मुद्दे उनकी केंद्रीयता और महत्त्व को रेखांकित करते हैं।

चीन–पाकिस्तान की मिलीभगत

भारत की विदेश नीति की बहस को आकार देने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटना संभवतः 22 अप्रैल को पहलगाम में हुआ आतंकी हमला था, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई और कश्मीर क्षेत्र में सामान्य स्थिति और स्थिरता की छवि बिखर गई। इसके तुरंत बाद ऑपरेशन ‘सिंदूर’ हुआ, जिसमें भारतीय वायुसेना को हुए नुकसान की संख्या सार्वजनिक नहीं की गई और सरकार ने अब तक हताहतों और मार गिराए गए आतंकियों के सटीक आँकड़े जारी नहीं किए हैं। रणनीतिक रूप से भारत को जीत मिली, लेकिन विजय की कथा को संभालने में वह सामरिक स्तर पर पिछड़ता दिखाई दिया।

इस दौरान कई स्तरों पर कूटनीतिक खेल भी चलते रहे। डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्षविराम की शुरुआत में अपनी निर्णायक भूमिका का दावा किया, जबकि भारत ने इसका खंडन करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने ही आक्रामकता रोकने का अनुरोध किया था। कुछ विश्लेषकों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप को नैतिक विजय से वंचित करना बाद में भारत पर लगाए गए शुल्क (टैरिफ) का एक कारण भी हो सकता है। इसके विपरीत, पाकिस्तान के नेतृत्व ने न केवल संघर्ष समाप्त कराने में ट्रंप की भूमिका की सराहना की, बल्कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित भी किया।

ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया था कि पाकिस्तान और चीन के बीच प्रत्यक्ष सामरिक तालमेल था, हालांकि भारतीय अधिकारियों ने इसे कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। चीन–पाकिस्तान की भारत-विरोधी मिलीभगत लंबे समय से भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता रही है, क्योंकि दो मोर्चों पर युद्ध की आशंका नई दिल्ली की रणनीतिक सोच पर हावी रही है। इस पूरे प्रकरण में भारत को अपनी नैतिक स्थिति को रेखांकित करने के लिए काफी ऊर्जा और संसाधन भी लगाने पड़े, जैसा कि दुनिया के कई देशों की यात्रा पर गए संसदीय प्रतिनिधिमंडलों से स्पष्ट था। हालांकि, उनकी उपस्थिति और उनके द्वारा प्रस्तुत कथाएँ जिन देशों में वे गए, वहाँ की तुलना में घरेलू मीडिया में अधिक दिखाई दीं।

शुल्क और प्रतिबंध

दूसरा प्रमुख घटनाक्रम अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए शुल्क, H1B वीज़ा पर नियंत्रण और उसके भारत पर पड़े प्रभाव से जुड़ा रहा। वैश्विक स्तर पर व्यापार व्यवस्था में भी बड़ा व्यवधान आया है और इसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ रही है। अमेरिका की आक्रामक व्यापार नीति ने भारत–अमेरिका संबंधों की बुनियाद को संरचनात्मक रूप से नुकसान पहुँचाया है, जो नई दिल्ली के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस के साथ भारत के संबंधों और भारत की प्रतिबंधात्मक बाज़ार नीतियों को लेकर तीखी भाषा का प्रयोग किया। हालांकि विद्वानों का कहना है कि विशेषकर कृषि और अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी मांगों को लेकर भारत की चिंताएँ वास्तविक हैं और अल्पकाल में इनके बदलने की संभावना नहीं है। भारत ने अमेरिका से आयात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील भी दी और इसी वर्ष भारत में टेस्ला मोटर्स की शुरुआत हुई।

ट्रंप की नीतियों, आलोचनाओं और प्रतिबंधों के परिणामस्वरूप भारत को रूस से तेल आयात भी कम करना पड़ा। मोदी–पुतिन की निजी कार यात्रा और लंबी बातचीत तथा हालिया दिल्ली में हुए भव्य स्वागत के बावजूद, भारत को अमेरिकी दबावों के आगे झुकना पड़ा। अमेरिका और यूरोप के साथ भारत की मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताएँ भी अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, क्योंकि कई द्विपक्षीय चिंताओं का समाधान नहीं हो पाया है। विद्वानों का यह भी तर्क है कि घरेलू सुधारों की कमी के कारण FTAs भारत के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं होते और कई मामलों में व्यापार घाटा ही बढ़ता है।

चीनी चालें

भारत के संदर्भ में चीन वह ‘हाथी’ है जो कमरे में मौजूद है। हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच शक्ति-अंतर और बढ़ा है और यही चीन के भारत को देखने का मुख्य आधार है। 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की सात वर्षों से अधिक समय बाद पहली चीन यात्रा के साथ भारत–चीन संबंधों में कुछ गर्माहट आई। यह काफी हद तक उन अमेरिकी व्यापार प्रतिबंधों का परिणाम था, जिनका सामना चीन और भारत—दोनों—को करना पड़ा।

फिर भी, भारत के साथ संबंधों में सुधार के बावजूद, चीनी अधिकारियों ने अरुणाचल प्रदेश के एक भारतीय नागरिक को अनुचित रूप से लंबे समय तक रोके रखा। साथ ही, चीन ने तिब्बत में यारलुंग—अर्थात ब्रह्मपुत्र—नदी पर अपना सबसे बड़ा बाँध बनाना शुरू किया, जिससे भारत को इस सीमा-पार नदी के संभावित रणनीतिक उपयोग को लेकर चिंता है। स्पष्ट है कि चीन की दबावकारी रणनीतियाँ निकट भविष्य में समाप्त होने वाली नहीं हैं।

बांग्लादेश संकट

अपने पड़ोस में, बांग्लादेश में कट्टर इस्लामी रुझान ने कई लोगों को चौंकाया है। हाल के समय में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं और लिंचिंग तथा आगजनी की घटनाएँ भारत में भी नोट की गई हैं। यह भारत–बांग्लादेश संबंधों में एक और निम्न बिंदु को दर्शाता है, जो पहले से ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे के दोबारा उठने से तनावपूर्ण हैं।

कठिन वर्ष

अंततः, भारत स्वयं को अमेरिका-नेतृत्व वाले गठबंधन ‘पैक्स-सिलिका’ से बाहर पाता है, जो महत्वपूर्ण और खनिज प्रौद्योगिकियों व संसाधनों से जुड़ा है। यह एक गंभीर रणनीतिक चिंता है, क्योंकि चीन दुर्लभ मृदा तत्वों का एकमात्र बड़ा वैकल्पिक स्रोत बना हुआ है, जो भारत के ऊर्जा और प्रौद्योगिकी संक्रमण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यद्यपि क्वाड में भी इसी तरह की पहल है, लेकिन अमेरिका के अंतर्मुखी रुख के कारण इस समूह का भविष्य भी अनिश्चित दिखता है। भारत–मध्य पूर्व–यूरोप कॉरिडोर (IMEC) जैसी अन्य पहलें भी संदेह के घेरे में हैं।

2025 वह वर्ष भी रहा जब दुनिया के कई हिस्सों में भारत-विरोधी भावनाएँ बढ़ीं। हथकड़ी लगाए गए अवैध प्रवासी—अर्थात भारतीय निर्वासित—जब सैन्य विमानों में ठूँसकर भेजे गए, तो इससे देश की छवि को नुकसान पहुँचा, लेकिन सरकार की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिखी। नवाचार, उपभोग और विकास में योगदानकर्ता के रूप में भारतीय समुदाय का स्वागत किए जाने की धारणा भी कमजोर पड़ती दिखी, खासकर कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में अपनाई गई भारत-केंद्रित आप्रवासन विरोधी नीतियों के चलते। यूनाइटेड किंगडम ने भी वीज़ा नियमों में बदलाव कर विदेशी छात्रों के लिए डिग्री के बाद रुकना कठिन बना दिया, जिसका मुख्य प्रभाव भारतीय छात्रों पर पड़ा।

कुल मिलाकर, 2025 भारत की विदेश नीति के लिए एक कठिन वर्ष रहा, जिसमें विकल्प सीमित होते चले गए और वर्ष के अंत तक भारत की विदेश नीति एक बार फिर बाध्यताओं, अवसरों और कठिन चुनावों से संचालित होती हुई प्रतीत हुई।

(लेखक जिंदल स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत (भारत) में प्रोफेसर एवं एसोसिएट एकेडमिक डीन हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। उनसे agodbole@jgu.edu.in पर संपर्क किया जा सकता है। यह श्रृंखला प्रो. अविनाश गोडबोले और प्रो. स्रीराधा दत्ता, JGU द्वारा संकलित है।)

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