भारत में व्हाइट-कॉलर आतंक और उनका कट्टरपंथी नेटवर्क

एक परिष्कृत व्हाइट-कॉलर आतंकवादी नेटवर्क के उजागर होने से कट्टरपंथ (रेडिकलाइज़ेशन) के बदलते स्वरूप और व्यापक सुरक्षा सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट होती है। जिन उपायों पर विचार किया जाना चाहिए, उनमें शामिल हैं:
a) शासन और सुरक्षा को स्थिर करने के लिए जम्मू-कश्मीर में दीर्घकालिक राष्ट्रपति शासन की पुनर्बहाली;
b) विशेषकर युवाओं और शिक्षित पेशेवरों के बीच एक संगठित और सतत डी-रेडिकलाइज़ेशन कार्यक्रम का क्रियान्वयन;
c) घाटी में भारतीय सेना की स्थायी मौजूदगी को मजबूत करना और छावनियों (कैंटनमेंट्स) की संख्या बढ़ाना; तथा
d) चुनाव तभी कराए जाएँ जब कश्मीरी पंडितों, डोगरों, सिखों और अन्य विस्थापित समुदायों सहित व्यापक सामुदायिक प्रतिनिधित्व व्यवहार्य हो।

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The doctors involved in the Delhi bomb blast

“व्हाइट-कॉलर आतंकवादी” शब्द अक्टूबर 2025 में सार्वजनिक विमर्श में आया, जब कश्मीरी डॉक्टरों के एक नेटवर्क के पास अत्यंत घातक रासायनिक विस्फोटक बनाने की सामग्री पाई गई। इनमें से एक डॉक्टर ने दिल्ली के लाल किले के पास एक कार में अधूरा बम गलती से विस्फोटित कर दिया, जिससे कई लोगों की मौत हो गई।

यह मॉड्यूल अनुच्छेद 370 और 35A के निरसन के पाँच वर्ष से अधिक समय बाद सामने आया, फिर भी इसका उभरना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए था। संवैधानिक परिवर्तनों से जम्मू-कश्मीर (J&K) में पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद में कमी तो आई, पर वह समाप्त नहीं हुआ। तीन दशकों से अधिक समय तक, कई शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न कश्मीरी युवाओं को कट्टरपंथी बनाकर पाकिस्तान-समर्थित आतंकी नेटवर्कों में भर्ती किया गया। कश्मीरी आबादी के कुछ वर्गों पर—खुले तौर पर या परोक्ष रूप से—पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने, चरमपंथी हिंसा को बढ़ावा देने, समर्थन करने या उसे सुगम बनाने के आरोप लगे, जिनमें लक्षित हत्याएँ और 4 लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों का सामूहिक विस्थापन शामिल है।

ऐतिहासिक संदर्भ, राजनीतिक विफलताएँ

कश्मीरी पंडित—कश्मीर घाटी के मूल निवासी हिंदू और मध्यकालीन दौर के धर्मांतरणों के बाद शेष बचा क्षेत्र का अंतिम हिंदू समुदाय—को 1980 के दशक के अंत और 1990 के शुरुआती वर्षों में पाकिस्तान-समर्थित उग्रवाद के उभार के दौरान भीषण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

कश्मीरी पंडितों के पलायन की जिम्मेदारी पर लंबे समय से बहस होती रही है। अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों के नेतृत्व वाली लगातार सरकारों पर शासन-प्रशासन की विफलताओं और राजनीतिक गलत आकलनों के आरोप लगाए गए। विश्लेषकों और कश्मीरी पंडित संगठनों का तर्क है कि अपर्याप्त प्रशासनिक प्रतिक्रिया और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) व हिज़्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के उभार ने भय का ऐसा माहौल बनाया, जिसमें “रालिव, त्सालिव या गालिव” (धर्म बदलो, निकल जाओ या मरो) जैसे धमकी भरे नारे गूंजे।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण और उसके बाद पाँच कैद आतंकियों की रिहाई को व्यापक रूप से एक ऐसा मोड़ माना जाता है जिसने आतंकी समूहों को और दुस्साहसी बना दिया। उस दौर के प्रमुख राजनीतिक व्यक्तियों से जोड़े गए बयान अक्सर मानवीय और सुरक्षा संकट के समय उदासीनता के प्रमाण के रूप में उद्धृत किए जाते हैं।

1990 के दशक की हिंसा—जिसमें कश्मीरी पंडितों का जातीय सफाया भी शामिल है—की उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच की लगातार माँग के बावजूद, ठोस जाँच आज तक नहीं हो सकी। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के दशक से जुड़ी घटनाओं के लिए ‘सत्य और सुलह आयोग’ (Truth and Reconciliation Commission) बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई।

अनुच्छेद 370 के बाद भी आतंक जारी

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—दो केंद्रशासित प्रदेशों—में विभाजित कर दिया। घोषणा से एक रात पहले, अशांति को रोकने के लिए फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सहित कई राजनीतिक नेताओं को निवारक हिरासत में लिया गया।

इसके बाद के वर्षों में आतंकी घटनाओं में कमी आई, लेकिन वे पूरी तरह रुकी नहींं। 2024 में, जब सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने का निर्देश दिया, तो कई विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने कहा कि जारी कट्टरपंथ के कारण क्षेत्र अभी तैयार नहीं है।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हिंदू पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले से उनकी चिंताएँ सही प्रतीत हुईं। जाँच में संकेत मिला कि उनकी मौजूदगी और गतिविधियों की जानकारी स्थानीय आबादी के कुछ हिस्सों को थी। इस पर टिप्पणी करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे (सेवानिवृत्त) ने कहा कि जमीनी हालात को पूरी तरह समझे बिना किए गए न्यायिक हस्तक्षेप अनजाने में आतंक-रोधी प्रयासों को कमजोर कर सकते हैं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णयों में सरकार और सशस्त्र बलों को अधिक परिचालन स्वायत्तता की आवश्यकता होती है।

व्हाइट-कॉलर आतंक नेटवर्क

19 अक्टूबर 2025 को, श्रीनगर के नौगाम क्षेत्र में धमकी भरे पोस्टरों की जाँच के दौरान जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक मॉड्यूल का पर्दाफाश हुआ। सीसीटीवी विश्लेषण से तीन ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) की गिरफ्तारी हुई, जिनकी पूछताछ में शोपियां के मौलवी और पूर्व पैरामेडिक मौलवी इरफान अहमद से संबंध सामने आए। आरोप है कि अहमद ने इमाम के रूप में अपनी स्थिति का उपयोग कर डॉक्टरों सहित शिक्षित पेशेवरों को कट्टरपंथी बनाया और जम्मू-कश्मीर, हरियाणा व उत्तर प्रदेश में नेटवर्क बनाए रखा।

इसके बाद छापों में जिनकी गिरफ्तारी हुई, वे हैं:

  • डॉ. आदिल अहमद राथर, सहारनपुर से—जिनके पूर्व कार्यस्थल के लॉकर से एक AK-47 राइफल बरामद हुई।

  • डॉ. मुज़म्मिल गनई, अल-फलाह यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद में—जिनके किराये के ठिकानों से अमोनियम नाइट्रेट सहित लगभग 2,900 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री और AK-सीरीज़ की दो राइफलें जब्त की गईं।

  • डॉ. उमर-उल-नबी, जिन्होंने कथित तौर पर घबराकर 10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास वाहन-आधारित विस्फोटक उपकरण को समय से पहले विस्फोटित कर दिया, जिसमें उनकी स्वयं की मृत्यु सहित 13 लोगों की मौत हुई।

डीएनए परीक्षण से नबी की विस्फोटक वाहन के चालक के रूप में पुष्टि हुई। जाँचकर्ताओं ने बाद में पाया कि नबी और गनई ने उसी वर्ष की शुरुआत में लाल किले की रेकी की थी।

अन्य गिरफ्तारियाँ:

  • डॉ. शाहीन सईद, लखनऊ स्थित डॉक्टर—जिन पर विस्फोटक सामग्री के लिए ₹20 लाख जुटाने का आरोप है।

  • आमिर राशिद अली, हुंडई i20 कार की खरीद और विस्फोटक तैयार करने से जुड़े।

  • जासिर बिलाल वानी, तकनीशियन—जो विस्फोटकों की ड्रोन-आधारित डिलीवरी प्रणालियों पर काम कर रहे थे।

अधिकारियों ने कश्मीर में 50 से अधिक डॉक्टरों से पूछताछ की। बताया गया कि यह मॉड्यूल टेलीग्राम जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करता था और कट्टरपंथ व फंडरेज़िंग के लिए—विशेषकर तुर्की—विदेश यात्राएँ आयोजित करता था।

फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी, जो एक मान्यता-प्राप्त निजी संस्थान है, कई आरोपियों का केंद्र बनकर उभरी, जिससे उसकी निगरानी प्रणालियों पर सवाल उठे।

नीतिगत सबक, आगे की राह

एक परिष्कृत व्हाइट-कॉलर आतंकी नेटवर्क का खुलासा कट्टरपंथ के बदलते स्वरूप और व्यापक सुरक्षा सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जिन उपायों पर विचार किया जाना चाहिए, उनमें शामिल हैं:

  • जम्मू-कश्मीर में शासन और सुरक्षा को स्थिर करने के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रपति शासन की पुनर्बहाली

  • विशेषकर युवाओं और शिक्षित पेशेवरों के बीच संगठित, सतत डी-रेडिकलाइज़ेशन कार्यक्रम का क्रियान्वयन

  • घाटी में भारतीय सेना की स्थायी मौजूदगी को मजबूत करना और छावनियों की संख्या बढ़ाना

  • चुनाव तभी कराना जब कश्मीरी पंडितों, डोगरों, सिखों और अन्य विस्थापित समूहों सहित व्यापक सामुदायिक प्रतिनिधित्व संभव हो

लेखक रणनीतिक मामलों के विश्लेषक तथा रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना के पूर्व प्रवक्ता हैं।
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