भारतीय उच्च शिक्षा में एआई से साक्षात्कार: ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ की खोज

जटिल प्रश्नों को हल करने और व्यक्तिगत लेखन शैलियों में सामग्री तैयार करने में एआई की क्षमता को देखते हुए, संस्थानों को कुछ बुनियादी सवालों पर विचार करना चाहिए—शिक्षा जगत (अकादमिक जगत) की क्या भूमिका है यह सुनिश्चित करने में कि शिक्षार्थी एआई के गुलाम न बनें, बल्कि ऐसे जागरूक ‘मालिक’ बनें जो एआई में मौजूद संभावित पक्षपात (बायस) और भ्रमजन्य उत्तरों (हैलुसिनेशन) को समझते हों, जिनका ज्ञान के अधिग्रहण और प्रसार पर गहरा प्रभाव पड़ता है?
क्या उच्च शिक्षा संस्थानों की यह सामाजिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे ऐसे अर्थपूर्ण पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पद्धतियाँ सुनिश्चित करें, जो इस तेज़ी से बदलते एआई युग में विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार करें?

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशेष रूप से जनरेटिव एआई, ने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में, और विशेष रूप से उच्च शिक्षा में, बड़ा परिवर्तन किया है। उच्च शिक्षा संस्थानों ने एआई साक्षरता को विद्यार्थियों के लिए एक प्रमुख दक्षता के रूप में स्वीकार किया है।
लेकिन एआई साक्षरता से हमारा क्या तात्पर्य है? क्या इसका अर्थ केवल सही प्रॉम्प्ट देना सीखना है ताकि डेटा तैयार किया जा सके, या इसमें डेटा की आलोचनात्मक जाँच करने की क्षमता भी शामिल है? क्या हम एआई का उपयोग केवल सामग्री निर्माण या जानकारी एकत्र करने के लिए कर रहे हैं?
यह प्रश्न इस ओर संकेत करता है कि हम एआई का कितना ज़िम्मेदाराना उपयोग कर रहे हैं और संस्थागत स्तर पर एआई नीतियों के माध्यम से किन नैतिक पहलुओं को संबोधित किया जाना चाहिए।

शिक्षा में एआई का एकीकरण व्यक्तिगत सीखने के अवसर प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ संज्ञानात्मक निर्भरता (कॉग्निटिव ऑफलोडिंग) और छात्रों की स्वायत्तता में कमी का जोखिम भी जुड़ा है। शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में, ‘एजेंसी’ का अर्थ है—सीखने वाले की यह क्षमता कि वह जानबूझकर, सूचित और स्वतंत्र निर्णय ले सके, जो आत्म-नियमन, मेटा-कॉग्निशन और आलोचनात्मक सोच पर आधारित होती है (Favero आदि, 2026)।
एआई टूल्स को बिना आलोचनात्मक दृष्टि के अपनाना छात्रों की स्वतंत्र सोच और आत्मबोध को कमजोर कर सकता है। एआई पर अत्यधिक निर्भरता से विद्यार्थी जानकारी की पुष्टि करना छोड़ देते हैं। बड़े भाषा मॉडल मौजूदा डेटासेट पर प्रशिक्षित होते हैं और अक्सर सबसे संभावित या मानक उत्तर देते हैं। इससे छात्रों की सोच एकरूप हो सकती है और विविध व्याख्याओं की वह गुंजाइश कम हो जाती है, जो सामान्यतः बौद्धिक नवाचार को जन्म देती है। एआई से बनी सामग्री की सुविधा सीखने की प्रक्रिया को सक्रिय ज्ञान-निर्माण से हटाकर निष्क्रिय उत्तर-उपभोग में बदल सकती है।

छात्रों की एजेंसी

यहाँ मुख्य तर्क छात्रों की ‘एजेंसी’ से जुड़ा है—यानी अपने विश्वासों और ज्ञान के निर्माण में स्वयं प्रमुख भूमिका निभाने का अधिकार और क्षमता—और साथ ही इस चुनौती से निपटने में उच्च शिक्षा की नैतिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी का प्रश्न भी।
शिक्षा का अंतिम उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि छात्रों को बुद्धिमान प्रणालियों के अनुरूप ढाल दिया जाए, बल्कि उन्हें इन प्रणालियों पर सवाल उठाने, उन्हें समझने और उनका ज़िम्मेदारी से उपयोग करने के लिए तैयार किया जाए। प्रश्न यह है कि हम—‘ह्यूमन्स इन द लूप’—इसे व्यवहार में कैसे ला सकते हैं?

भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था ने विभिन्न शैक्षणिक क्षेत्रों—जैसे STEM विषयों, प्रबंधन और उदार कलाओं—में एआई को एकीकृत करने के लिए कई पहलें की हैं। समर्पित केंद्रों और वित्तपोषित परियोजनाओं के माध्यम से एक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, उच्च शिक्षा संस्थान आम जनता में एआई जागरूकता फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं—जैसे आईआईटी मद्रास का स्वयं प्रो कोर्स तथा स्कूल स्तर पर एआई साक्षरता के लिए एआई समर्थ पहल।

FICCI-EY-P AI Adoption Survey 2025 के अनुसार (30 संस्थानों के उत्तरों पर आधारित), भारत के 57 प्रतिशत उच्च शिक्षा संस्थानों में पहले से एआई नीति मौजूद है। एक ओर यह नमूना छोटा है और यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कितने संस्थानों में ऐसी नीतियाँ हैं। दूसरी ओर, अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इन नीतियों को संस्थागत स्तर पर कैसे लागू किया जा रहा है।
संस्थान ‘एआई साक्षरता’ को कैसे समझते हैं और छात्रों तथा शिक्षकों में यह दक्षता विकसित करने के लिए क्या रणनीतियाँ बनाते हैं?
यद्यपि एआई साक्षरता की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है, फिर भी अधिकांश परिभाषाएँ चार आयामों पर केंद्रित हैं—कार्यात्मक साक्षरता, नैतिक साक्षरता, भाषिक/वाक्पटु (रिटोरिकल) साक्षरता और शैक्षिक (पेडागॉजिकल) साक्षरता।

उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए प्रश्न

यद्यपि सभी नीतियों में एआई के नैतिक और जिम्मेदार उपयोग पर जोर दिया गया है, फिर भी यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि इसे रोज़मर्रा के सीखने के वातावरण में कैसे लागू किया जाएगा। डिजिटल एजुकेशन काउंसिल (2024) के एक सर्वे के अनुसार, 16 देशों के छात्रों में 86 प्रतिशत छात्र एआई टूल्स का उपयोग करते हैं, लेकिन हर दो में से एक छात्र स्वयं को एआई के लिए तैयार नहीं मानता।
क्या संस्थान यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके छात्र एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं? क्या एआई के नैतिक उपयोग को केवल वेबिनार या प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से सिखाया जा सकता है, या इसे पाठ्यक्रम में समाहित किया जाना चाहिए?

शुरुआती चरण में, एआई-प्रतिरोधी मूल्यांकन और प्लेज़रिज़्म जाँच उच्च शिक्षा में एआई से निपटने के सबसे लोकप्रिय उपाय थे। लेकिन केवल कड़े नियमों और दंड के माध्यम से अकादमिक बेईमानी से निपटना एक सुरक्षित सीखने का वातावरण नहीं बना सकता, क्योंकि विश्वास का निर्माण आवश्यक है।
अब ध्यान एआई-संयोजित शिक्षण और मूल्यांकन पर है, जहाँ शिक्षक अधिक प्रामाणिक मूल्यांकन पद्धतियों को अपनाते हैं और एआई को सहयोगी के रूप में देखते हैं। यहाँ शिक्षक यह तय करते हैं और स्पष्ट रूप से बताते हैं कि सीखने और मूल्यांकन में एआई की भूमिका क्या होगी।

जटिल प्रश्नों को हल करने और व्यक्तिगत लेखन शैलियों में सामग्री तैयार करने की एआई की क्षमता को देखते हुए, संस्थानों को फिर से यह मूल प्रश्न पूछना चाहिए—सीखने वालों को एआई का गुलाम बनने से रोकने और उन्हें इसके संभावित पक्षपात तथा भ्रमजन्य उत्तरों के प्रति सजग ‘मालिक’ बनाने में शिक्षा जगत की क्या भूमिका है?
क्या इस तीव्र गति से बदलते एआई युग में विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार करने हेतु अर्थपूर्ण पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पद्धतियाँ विकसित करना उच्च शिक्षा संस्थानों की सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं है?

शिक्षकों की भूमिका

सामाजिक निर्माणवादी दृष्टिकोण से देखें तो उच्च शिक्षा संस्थान ऐसे स्थल हैं जहाँ ज्ञान उभरता है, उस पर विमर्श होता है और वह सामाजिक रूप से निर्मित होता है। इसके लिए एक ऐसा शिक्षण मॉडल आवश्यक है जो रैखिक न होकर पुनरावृत्त, लचीला और उभरता हुआ हो। इसलिए शिक्षाशास्त्रीय लक्ष्य केवल संज्ञानात्मक उपलब्धि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गहन जाँच-पड़ताल और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने वाली रणनीतियों पर आधारित होता है।
यहाँ शिक्षक एक सहायक और मार्गदर्शक की भूमिका में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। समालोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के प्रमुख विचारक हेनरी गिरू (2018) के अनुसार, शिक्षकों को परिवर्तनकारी बौद्धिक होना चाहिए—सिर्फ पाठ्यक्रम का तकनीकी रूप से क्रियान्वयन करने वाले नहीं। उनका उद्देश्य सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक परिवर्तन होना चाहिए।

दक्षिण के देशों में विमर्श का केंद्र यह होना चाहिए कि एआई का हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और वे एल्गोरिदम कैसे कुछ क्षेत्रों और समुदायों की आवाज़ को दबा देते हैं। इस प्रकार कक्षाएँ तटस्थ शिक्षण स्थल नहीं, बल्कि विमर्श और संघर्ष के स्थल बन जाती हैं।
क्या उच्च शिक्षा संस्थान एआई से भरे सीखने के वातावरण में इन मूल्यों और परंपराओं को बनाए रख पाएँगे?
अलग-अलग नीतियों और प्रथाओं को अलग-थलग विकसित करने के बजाय, उच्च शिक्षा संस्थानों को मिलकर इस बात पर विमर्श करना चाहिए कि अर्थपूर्ण ढंग से ‘आलोचनात्मक एआई साक्षरता’ को बढ़ावा देना उनकी सामूहिक ज़िम्मेदारी कैसे हो सकती है।

(लेखिका बेंगलुरु स्थित क्राइस्ट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) में समाजशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर और टीचिंग-लर्निंग एन्हांसमेंट सेल की समन्वयक हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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