दक्षिण एशिया में जलवायु आपदाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी हेतु एआई
कमज़ोरियों के विश्लेषण (Vulnerablity analytics) के माध्यम से एआई उन आबादियों की पहचान कर सकता है जिन्हें आपदा के बाद उबरने में अधिक कठिनाई हो सकती है—जैसे बागान क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय, कम आय वाले परिवार और बाढ़-मैदानों में स्थित बस्तियाँ। भारत ने श्रीलंका में चक्रवात के बाद पुनर्प्राप्ति के लिए पहले ही 45 करोड़ अमेरिकी डॉलर का कोष आवंटित किया है। इस कोष के प्रबंधन के लिए भारत और श्रीलंका द्वारा गठित संयुक्त समिति, श्रीलंका के डिजिटलाइजेशन कार्यक्रम के तहत एआई-आधारित आपदा चेतावनी प्रणालियाँ लागू कर सकेगी, जिसे भारत का समर्थन प्राप्त है।
दक्षिण एशिया के कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल का उपयोग करने की पहल की है, जो उपग्रह चित्रों, मौसम पूर्वानुमानों, ऐतिहासिक बाढ़ डेटा और स्थलाकृति को एकीकृत कर ऐसी प्रणालियाँ विकसित करते हैं जो दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों—विशेषकर श्रीलंका—में 72 घंटे पहले तक की बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हैं। ये प्रणालियाँ अनेक डेटा-स्रोतों का विश्लेषण करती हैं और कुछ नदी घाटियों में प्रमुख जलवायु घटनाओं के लिए 85 प्रतिशत तक की सटीकता दिखा चुकी हैं—खासतौर पर वर्षा और चरम मौसम पूर्वानुमान में।
वैज्ञानिकों को विश्वास है कि मौसम विज्ञान, जल विज्ञान और उपग्रह डेटा को मिलाकर एआई अत्यधिक वर्षा की मात्रा, चक्रवातों के व्यवहार, बाँधों में जल-प्रवाह (इनफ्लो) और निचले इलाकों में बाढ़ का पूर्वानुमान लगा सकता है। ऐसी क्षमताएँ हाल ही में आए चक्रवात ‘डिटवाह’ जैसी आपदाओं में—जिसने श्रीलंका, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और भारत के कुछ हिस्सों में व्यापक तबाही मचाई—मृतकों की संख्या को काफ़ी हद तक कम कर सकती थीं।
यॉर्क सेंट जॉन यूनिवर्सिटी – लंदन कैंपस के एसोसिएट प्रोफेसर और एसोसिएट डीन (डेटा साइंस एवं कंप्यूटर साइंस) डॉ. नलिंदा सोमासिरी ने अपनी टीम—डॉ. स्वाति गणेशन (एसोसिएट डीन), डॉ. सूनलेह लिंग, डॉ. अनु बाला, डॉ. रेबेका बालासुंदरम, संगीता पोखरेल और डॉ. रश्मि सिद्धालिंगप्पा—के साथ मिलकर ‘जियोएआई’ कार्यक्रम शुरू करने की पहल की है। यह पहल सरकारों, विश्वविद्यालयों और तकनीकी विशेषज्ञों को एक मंच पर लाती है, ताकि एआई को जीआईएस (भू-स्थानिक डेटा) के साथ जोड़कर प्रारंभिक चेतावनियाँ मज़बूत की जा सकें, जोखिम मानचित्र तैयार हों, वास्तविक समय में खतरों की निगरानी संभव हो और एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर बने।
चक्रवात डिटवाह: एक चेतावनी
डॉ. सोमासिरी के अनुसार, चक्रवात डिटवाह के श्रीलंका पर पड़े विनाशकारी प्रभाव ने एक ऐसी सच्चाई उजागर कर दी है जिसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जलवायु-प्रेरित आपदाएँ अधिक बार, अधिक विनाशकारी और अधिक अप्रत्याशित होती जा रही हैं। अचानक आई बाढ़ ने रातों-रात समुदायों को निगल लिया, जबकि मध्य उच्चभूमि में भूस्खलनों ने सड़कों, घरों और पूरे परिवारों को दफ़न कर दिया। हज़ारों लोग विस्थापित हुए, सैकड़ों की जान गई और महत्वपूर्ण अवसंरचना ठप पड़ गई।
यह पहल संयुक्त राष्ट्र के ‘अर्ली वार्निंग्स फ़ॉर ऑल’ कार्यक्रम के अनुरूप है। इसका उद्देश्य एआई-सक्षम प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ, जलवायु बुद्धिमत्ता (क्लाइमेट इंटेलिजेंस) और लचीली अवसंरचना योजना विकसित करना है—विशेषकर उन देशों के लिए जो बढ़ते जलवायु दबावों का सामना कर रहे हैं।
चक्रवात डिटवाह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि श्रीलंका को पूर्वानुमान, प्रतिक्रिया और पुनर्निर्माण—तीनों चरणों में—एआई-सक्षम क्षमताओं की तत्काल आवश्यकता है। डॉ. सोमासिरी ने पाँच ऐसे आयामों की पहचान की है, जहाँ एआई श्रीलंका की आपदा प्रबंधन प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।
एआई, जीआईएस और वास्तविक समय जोखिम मानचित्रण
मशीन लर्निंग के साथ एकीकृत जीआईएस, मानचित्रों और उपग्रह चित्रों से पैटर्न पहचानने में सक्षम बनाता है, जिससे भूमि की स्थिति, जल-स्तर और जोखिम क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का स्वत: पता लगाया जा सकता है। एआई और रिमोट सेंसिंग को मिलाकर भूस्खलन-संभावना का मानचित्रण किया जा रहा है और प्रारंभिक चेतावनियाँ दी जा रही हैं।
उपग्रहों, ड्रोन और बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग के माध्यम से वास्तविक समय निगरानी, बाढ़ के बढ़ते जल-स्तर, मिट्टी में नमी, ढलानों की अस्थिरता और वनस्पति में बदलाव जैसे शुरुआती संकेतों की पहचान संभव बनाती है—जो जंगल की आग के जोखिम या बढ़ती संवेदनशीलता का संकेत दे सकते हैं। ये प्रणालियाँ अधिकारियों को उभरते खतरों को देखने और आपदा से पहले कार्रवाई करने में मदद करती हैं।
डॉ. सोमासिरी का मानना है कि एआई ऊँचाई मॉडल, मिट्टी के प्रकार, ढलान-ढाल, भूमि उपयोग पैटर्न, बागान क्षेत्र, वर्षा की तीव्रता और ऐतिहासिक भूस्खलन डेटा को एक साथ जोड़ सकता है। इसके बाद मशीन-लर्निंग मॉडल हर कुछ घंटों में अपडेट होने वाले गतिशील भूस्खलन जोखिम सूचकांक तैयार कर सकते हैं।
अभूतपूर्व आपदाओं के लिए तैयारी
आधुनिक आपदाएँ अक्सर ऐतिहासिक उदाहरणों से आगे निकल जाती हैं। जेनरेटिव एआई ऐसे कृत्रिम (सिंथेटिक) चरम-घटना परिदृश्य बना सकता है—जैसे डिटवाह से भी अधिक तीव्र चक्रवातों के मार्ग, पहले कभी दर्ज न हुई वर्षा-प्रवृत्तियाँ, लंबे समय तक बारिश से उत्पन्न श्रृंखलाबद्ध भूस्खलन, और बाँधों पर दबाव की जाँच (स्ट्रेस-टेस्ट) के परिदृश्य। ये सिमुलेशन आपदा एजेंसियों, स्थानीय प्रशासन और सेना को “ऐसी भविष्य की आपदाओं” के लिए अभ्यास और तैयारी का अवसर देते हैं जिन्हें हमने पहले कभी नहीं देखा।
आपदा संदेशों को सामान्य चेतावनियों से आगे बढ़कर व्यक्तिगत चेतावनियों, भौगोलिक रूप से सटीक जोखिम आकलन, बहुभाषी निर्देशों और प्रभाव-आधारित मार्गदर्शन में बदलना होगा। उदाहरण के लिए, लोगों को इस तरह की चेतावनी मिल सकती है: “आपके क्षेत्र में एक मीटर तक बाढ़ आ सकती है; दो घंटे के भीतर ऊँचे स्थान पर चले जाएँ।”
इसे संभव बनाने के लिए एआई प्रणालियाँ वास्तविक समय वर्षा डेटा, जलाशयों की टेलीमेट्री, उपग्रह अपडेट, जनता से आने वाले SOS संदेश, सड़कों की उपलब्धता की स्थिति, अस्पतालों की क्षमता और पूर्वानुमान की अनिश्चितताओं को एकीकृत कर सकती हैं। परिणामस्वरूप मोबाइल फ़ोन, टीवी चैनलों, रेडियो नेटवर्क और सार्वजनिक सायरनों के माध्यम से स्पष्ट, उपयोगी और मानव-केंद्रित चेतावनियाँ दी जा सकती हैं।
यह एआई-संचालित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली उस प्लेटफ़ॉर्म के समान है, जिसे डॉ. सोमासिरी ने मोटोरोला में डिज़ाइन करने में मदद की थी—जहाँ स्थितिजन्य जागरूकता सॉफ़्टवेयर, वास्तविक समय खुफ़िया फ़ीड और त्वरित संचार मिलकर जान बचाते हैं।
आपदा के बाद पुनर्प्राप्ति और लचीलापन योजना
आपदा के बाद, एआई-संचालित उपग्रह चित्र विश्लेषण से ढही इमारतों की पहचान, जलमग्न क्षेत्रों का 90 प्रतिशत सटीकता के साथ मानचित्रण, अवरुद्ध सड़कों और बह गए पुलों का पता लगाना, कृषि नुकसान का आकलन और त्वरित राहत की प्राथमिकता तय करना संभव है। ऐसे एआई-समर्थित तंत्र, हफ्तों लगने वाले मैनुअल सर्वेक्षणों को लगभग तात्कालिक आकलन में बदल सकते हैं।
एआई सरकारों को वंचित समुदायों की पहचान करने और महत्वपूर्ण पुनर्प्राप्ति प्रश्नों के उत्तर देने में भी मदद कर सकता है: किन परिवारों को तुरंत पुनर्वास की आवश्यकता है? अस्थायी आश्रयों का विस्तार कहाँ किया जाए? किन पुलों, अस्पतालों और स्कूलों का पुनर्निर्माण पहले होना चाहिए? भविष्य के जोखिम को कम करने के लिए कौन-से अवसंरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं?
कमज़ोरियों के विश्लेषण के ज़रिए एआई उन आबादियों को उजागर कर सकता है जिन्हें उबरने में अधिक कठिनाई होगी—जैसे बागान समुदाय, कम आय वाले परिवार और बाढ़-मैदानों में स्थित बस्तियाँ। भारत ने श्रीलंका की चक्रवात-पश्चात पुनर्प्राप्ति के लिए पहले ही 45 करोड़ अमेरिकी डॉलर का कोष आवंटित किया है। इस कोष के प्रबंधन के लिए भारत और श्रीलंका द्वारा गठित संयुक्त समिति, भारत-समर्थित श्रीलंका के डिजिटलाइजेशन कार्यक्रम के तहत एआई-आधारित आपदा चेतावनी प्रणालियाँ लागू कर सकेगी।
(लेखक, श्रीलंका के पूर्व राजनयिक, राजनीतिक और रणनीतिक मामलों के टिप्पणीकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। उनसे sugeeswara@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Post a Comment