जब क्रिकेट ‘सिर्फ क्रिकेट’ नहीं रह जाता: दक्षिण एशिया में खेल कूटनीति का सिकुड़ता दायरा
यह खेल का महिमामंडन करने या उसकी कूटनीतिक क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आह्वान नहीं है। न ही क्रिकेट ने कभी दक्षिण एशिया के संघर्षों का समाधान किया है। लेकिन उसने उनके तीखेपन को कुछ हद तक कम ज़रूर किया। उसने लोगों को यह याद दिलाया कि सीमाओं और विवादों के बावजूद एक साझा सांस्कृतिक भाषा भी मौजूद है। अब उस भाषा का क्षरण पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। क्योंकि जब सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सबसे सरल रूप भी कठिन हो जाते हैं, तो भरोसे का पुनर्निर्माण अनंत रूप से अधिक कठिन हो जाता है।
क्रिकेट दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय संपर्क के उन गिने-चुने मंचों में से एक रहा है, जो औपचारिक संस्थाओं के कमजोर पड़ने के बावजूद टिके रहे। इसने युद्ध, शासन परिवर्तन, सीमा संकटों और कूटनीतिक ठहरावों को भी झेला। जब औपचारिक कूटनीति विफल हो जाती थी, तब क्रिकेट क्षेत्रीय अपनत्व की भावनात्मक स्मृति को आगे बढ़ाता था। उसने दक्षिण एशिया को — भले ही क्षणिक रूप से — एक साझा सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में कल्पित करने का अवसर दिया। ऐसे में बांग्लादेश का भारत में निर्धारित टी-20 विश्व कप मैच खेलने से पीछे हटने का हालिया फैसला केवल खेल या प्रशासनिक मामला मानकर नहीं टाला जा सकता। यह एक दरार है और उस सांस्कृतिक व्याकरण का कमजोर पड़ना है, जिसने अतीत में दक्षिण एशिया को जोड़े रखा था।
बांग्लादेश के सख्त रुख के पीछे एक तात्कालिक कारण मुस्ताफिज़ुर रहमान से जुड़ा विवाद रहा। बांग्लादेश के प्रमुख बाएं हाथ के तेज गेंदबाज रहमान को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) 2026 सत्र के लिए कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) ने अनुबंधित किया था, और वे लीग के इतिहास में सबसे महंगे बांग्लादेशी खिलाड़ी बने थे। लेकिन इसके बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के निर्देश पर उन्हें अचानक टीम से रिलीज़ कर दिया गया। राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में हुई यह बिना स्पष्टीकरण वाली कार्रवाई बांग्लादेश में व्यापक रूप से एक खेल संबंधी नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णय के रूप में देखी गई।
बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने, सरकारी परामर्शों के समर्थन के साथ, सार्वजनिक रूप से कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसकी राष्ट्रीय टीम 2026 आईसीसी पुरुष टी-20 विश्व कप के लिए भारत की यात्रा नहीं करेगी। इसके पीछे सुरक्षा और सम्मान से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया गया है। इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश ने कोलकाता और मुंबई में होने वाले अपने निर्धारित मैचों को श्रीलंका स्थानांतरित करने की मांग की है, जिसे आईसीसी ने फिलहाल स्वीकार नहीं किया है।
बदलते शक्ति-संतुलन
इसके विपरीत, भारत-पाकिस्तान क्रिकेट कूटनीति ने अब भी एक सीमित लेकिन पहचाने जाने योग्य सकारात्मक भूमिका बनाए रखी है। युद्धों, आतंकवादी हमलों और लंबे कूटनीतिक गतिरोधों के बावजूद दोनों देशों के बीच क्रिकेट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। मैच कभी-कभी लंबे समय के लिए स्थगित हुए, लेकिन पूरी तरह मिटाए नहीं गए। क्रिकेट एक नियंत्रित ‘प्रेशर वाल्व’ की तरह काम करता रहा है — चयनात्मक और सख्ती से प्रबंधित, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से सुरक्षित।
इस निरंतरता के पीछे काफी हद तक दक्षिण एशियाई क्रिकेट दर्शकों की उत्सुकता रही है, जिसने राष्ट्रवादी भावनाओं से भरे होने के बावजूद इस तमाशे को जीवित रखा। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक शत्रुतापूर्ण संबंध में भी कुछ सांस्कृतिक चैनलों को पूरी तरह काट देना बहुत मूल्यवान समझा गया। बांग्लादेश का फैसला एक अलग क्षेत्रीय स्वभाव की ओर संकेत करता है, जिसे प्रबंधित प्रतिद्वंद्विता के बजाय दूरी बनाने के माध्यम से व्यक्त किया जा रहा है। क्षेत्रीय राजनीति में, दूरी बनाना अक्सर टकराव से भी अधिक दूरगामी परिणाम पैदा करता है।
यह दक्षिण एशिया के भीतर बदलते शक्ति-संतुलन की भी ओर इशारा करता है। आज बांग्लादेश आंतरिक चुनौतियों के बावजूद पहले की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक सक्षम और कूटनीतिक रूप से अधिक विविध संबंधों वाला देश है। उसकी विदेश नीति अब किसी एक संबंध या विरासत में मिली भावनाओं पर आधारित नहीं है। ऐसे संदर्भ में, सांस्कृतिक विनम्रता स्वतः नहीं आती — खासकर उन क्षेत्रों में, जहां भारत को स्वाभाविक रूप से केंद्रीय मान लिया जाता रहा है। क्रिकेट अब वह स्थान बन गया है, जहां असमानताएं सबसे अधिक प्रत्यक्ष रूप से महसूस होती हैं।
भारत के लिए यह प्रकरण अपने पड़ोस में उसकी सॉफ्ट पावर को लेकर असहज सवाल खड़े करता है। इसे अक्सर आकार, दृश्यता और सांस्कृतिक पहुंच का स्वाभाविक परिणाम मान लिया जाता है। लेकिन सॉफ्ट पावर, भौतिक शक्ति के विपरीत, पारस्परिकता और संवेदनशीलता से टिकती है। यह उपेक्षा और असंतुलन की संचित धारणाओं से धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। जब पड़ोसी सांस्कृतिक सहभागिता से पीछे हटते हैं, तो इसका कारण प्रायः कोई एक शिकायत नहीं होता, बल्कि यह भावना होती है कि संबंध अब परस्पर नहीं रह गया है।
सांस्कृतिक स्पेस का सिमटना
व्यापक स्तर पर यह दक्षिण एशिया के बिखरते परिदृश्य की कहानी है, जहां यह क्षेत्र अब संस्थाओं, विचारधारा या साझा उपनिवेश-विरोधी स्मृतियों से नहीं जुड़ा हुआ है। इसके बजाय देश अब द्विपक्षीय गणनाओं, छोटे उप-क्षेत्रीय समूहों और क्षेत्र से बाहर के साझेदारों पर अधिक निर्भर हो गए हैं। ऐसे वातावरण में क्रिकेट कूटनीति अत्यंत नाजुक हो जाती है।
क्षेत्रीय ‘गोंद’ के रूप में क्रिकेट का कमजोर पड़ना यह नहीं दर्शाता कि उसकी राजनीतिक महत्ता समाप्त हो गई है। लेकिन जब क्रिकेट ‘सिर्फ क्रिकेट’ नहीं रह जाता, तो यह संकेत देता है कि सह-अस्तित्व को बनाए रखने वाले अनौपचारिक नियम पतले पड़ रहे हैं। यह यह भी बताता है कि दक्षिण एशिया की वह भावनात्मक अर्थव्यवस्था, जो पारस्परिक मान्यता से समृद्ध थी, अब राष्ट्रीय हितों की ठंडी गणना से प्रतिस्थापित हो रही है।
यह न तो खेल को आदर्श बनाने की अपील है और न ही उसकी कूटनीतिक भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की कोशिश। क्रिकेट ने कभी भी दक्षिण एशिया के संघर्षों का समाधान नहीं किया। लेकिन उसने उनके किनारों को मुलायम किया। उसने यह याद दिलाया कि सीमाओं और विवादों के बावजूद एक साझा सांस्कृतिक भाषा मौजूद है। अब उस भाषा का क्षरण पूरे दक्षिण एशिया को चिंतित करना चाहिए। क्योंकि जब सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सबसे सरल रूप भी कठिन हो जाते हैं, तो विश्वास का पुनर्निर्माण कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
क्या दक्षिण एशिया की त्रासदी शक्ति या पहचान की अनुपस्थिति रही है? शायद नहीं। वास्तविक त्रासदी उन स्थानों का धीरे-धीरे सिकुड़ना है, जहां दोनों बिना किसी दबाव के सह-अस्तित्व में रह सकते थे। क्रिकेट हमेशा ऐसा ही एक स्थान रहा है। इसलिए असली समस्या उसका राजनीतिकरण नहीं, बल्कि उसका परित्याग है। यदि यह दौर बिना आत्ममंथन के गुजर गया, तो दक्षिण एशिया उस खेल को खो देने का जोखिम उठाएगा, जो उन अंतिम दर्पणों में से एक था, जिनमें वह अब भी स्वयं को पहचान सकता था।
(लेखिका जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग में पीएचडी शोधार्थी हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। उनसे संपर्क: sancharighosh093@gmail.com)

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