जीवन से ABC को विदा करें, ताकि जीवन में XYZ का स्वागत हो सके

लगातार शोर और भागदौड़ के इस युग में, हम सकारात्मक आदतें अपनाकर जीवन में संतुलन फिर से स्थापित कर सकते हैं। ABC को त्यागना हमें शांति, संतोष, छोड़ देने की भावना और कृतज्ञता का दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है। ऐसे मनोभाव के साथ प्रकृति के सान्निध्य में बिताया गया गुणवत्तापूर्ण समय या अन्य आत्मा को ऊँचा उठाने वाली गतिविधियाँ हमें स्वस्थ कर सकती हैं। यह सब मिलकर हमारे भीतर शांति, सुकून और प्रसन्नता का एक आश्रय निर्मित कर सकता है।

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मानवीय अनुभव मूलतः आत्म-अभिव्यक्ति के अर्थपूर्ण रूप, जीवन के उत्साह और आंतरिक शांति की खोज से संचालित होता है। किंतु हमारी कुछ जड़ जमा चुकी आदतें और दृष्टिकोण इस लक्ष्य की प्राप्ति में गंभीर बाधाएँ बन जाते हैं। जब तक हम इन्हें रोकते या छोड़ते नहीं, ये हमारी प्रामाणिकता को क्षीण करते हैं, हमारी ऊर्जा को चूस लेते हैं और मानसिक शांति छीन लेते हैं। ये आत्म-हानिकारक प्रवृत्तियाँ हैं—आसक्ति, दोषारोपण का खेल और तुलना—यानी ABC।

A – आसक्ति (Attachment):
चाहे वह रिश्ते हों, धन हो या भौतिक वस्तुएँ—इनके प्रति हमारी स्वार्थपूर्ण आसक्ति हमें छोटा कर देती है। ‘हम’ के दायरे को सीमित करके हम अपने हृदय को संकुचित कर लेते हैं। निजी स्वामित्व के प्रति जुनून से उपजा आत्मकेंद्रित भाव हमें खुले दिल और सकारात्मक सोच से वंचित करता है, जिससे हम व्यापक हित के लिए विकसित होने में अक्षम हो जाते हैं।

B – दोषारोपण का खेल (Blame-game):
दैनिक जीवन में आने वाली असुविधाएँ या समस्याएँ अनेक होती हैं और कई बार टाली नहीं जा सकतीं। यद्यपि हम उन्हें अवसर, सीख या धैर्य की परीक्षा के रूप में देख सकते हैं, फिर भी हम अपराधबोध और जवाबदेही से बचने या अपनी निष्कलंकता साबित करने के लिए दोषारोपण का सहारा लेते हैं। शिकायत करने और स्वयं का बचाव करने की आदत न केवल हमें दुखी बनाती है, बल्कि दूसरों की प्रतिक्रिया या विवेकपूर्ण सलाह पाने से भी रोकती है। इससे हमारी क्षमता का विकास रुक जाता है और हम पूर्ण, संतोषजनक जीवन जीने से वंचित रह जाते हैं।

C – तुलना (Comparisons):
सोशल मीडिया के कारण हम लगातार अपनी तुलना दूसरों से करने लगे हैं। यह आदत निराशा, ईर्ष्या और असंतोष का सामान्य नुस्खा है। अवास्तविक अपेक्षाएँ और हीनता की भावना पैदा करके, तुलना हमारे आत्म-सम्मान और कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। थियोडोर रूज़वेल्ट ने चेताया था—“तुलना आनंद की चोर है।” तुलना में जिया गया जीवन वास्तव में दुख में जिया गया जीवन होता है।

जड़ जमाई आदतों का परित्याग

जब हम समझ लेते हैं कि ये तीन जड़ जमा चुकी आदतें या दृष्टिकोण हमें कितना नुकसान पहुँचाते हैं और उन्हें छोड़ने का निर्णय लेते हैं, तब हम नए X-फैक्टर, Y-यौवन और Z—ज़ेन जैसी शांत चित्तावस्था—अर्थात XYZ की खोज के लिए सशक्त हो जाते हैं।

X – X-फैक्टर:
ABC को त्यागना रूपांतरकारी हो सकता है। यह परित्याग हमें जीवन में नए गुण अपनाने और ऐसी व्यक्तित्व संरचना करने का अवसर देता है जो भीड़ और साधारण से अलग हो। इस परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरते हुए हम अपने भीतर के आत्म-स्वरूप का चरित्र धीरे-धीरे गढ़ते हैं। सकारात्मक गुणों के साथ एक नई प्रकृति जन्म लेती है और हम सृजनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में—X-फैक्टर बनकर—दुनिया के सामने सचमुच जीने लगते हैं।

Y – यौवन (Youthfulness):
ABC में हमारी उलझन ऊर्जा, जिज्ञासा, मानसिक चपलता और जीवन के उत्साह को क्षीण कर देती है। वास्तव में हम केवल उम्र बढ़ने से ही बूढ़े नहीं होते, बल्कि ABC से मित्रता करने के कारण भी बूढ़े हो जाते हैं। आत्म-नवीकरण के लिए आवश्यक है कि हम दुर्बल करने वाली आदतों और मानसिकताओं को विदा करें और वर्तमान में सार्थक संलग्नताओं का स्वागत करें, जो ताज़ी और युवा बुद्धिमत्ता से भरी हों।

Z – ज़ेन जैसी मानसिक शांति:
लगातार शोर और जल्दबाज़ी के इस दौर में, हम सकारात्मक आदतें विकसित करके संतुलन पुनः प्राप्त कर सकते हैं। ABC को छोड़ना हमें शांति, संतोष, त्याग और कृतज्ञता का भाव विकसित करने में मदद करता है। ऐसे मन के साथ प्रकृति के सान्निध्य में बिताया गया गुणवत्तापूर्ण समय या अन्य आत्मा को ऊर्जित करने वाली गतिविधियाँ हमें स्वस्थ कर सकती हैं। यह सब मिलकर हमारे भीतर शांति, सुकून और प्रसन्नता का एक सुरक्षित आश्रय रच सकता है।

(लेखक पूर्व भारतीय बैंकर एवं संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के सलाहकार रह चुके हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। उनसे rkrishnasinha@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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