सत्तारूढ़ भाजपा के राजनीतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद, भारतीय लोकतंत्र पर सवाल

हाल के वर्षों में, संचालनात्मक स्तर पर भारत के लोकतंत्र को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ (partly free) की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन इसका प्रत्यक्ष पतन शायद सबसे अधिक उस अविश्वास में दिखाई देता है, जो चयनात्मक मतदाता पुनरीक्षण के नौकरशाही आदेश से उत्पन्न हुआ है। इस प्रक्रिया में बिना किसी स्पष्ट ऑडिट और बिना नाम हटाने की व्याख्या या सुधार के लिए पर्याप्त समय दिए मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। ऐसे घटनाक्रमों के चलते दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दर्जा संकटग्रस्त प्रतीत होता है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा-प्रणीत एनडीए सरकार के लिए पिछला वर्ष सत्ता के सुदृढ़ीकरण का वर्ष रहा है। 2024 के आम चुनावों में कम बहुमत मिलने के बावजूद, सरकार ने कई राज्य चुनावों में सत्ता में वापसी की और सहयोगी दलों के साथ एकजुटता बनाए रखी। भाजपा ने 2025 में दिल्ली और बिहार में जीत दर्ज की—दिल्ली में 27 वर्षों बाद सत्ता में लौटते हुए और बिहार में क्षेत्रीय दल जद(यू) के साथ गठबंधन कर संभावित सत्ता-विरोधी माहौल को पार करते हुए। बिहार सरकार में भाजपा को गृह मंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष सहित मंत्रिमंडल के अहम पद मिले।

पार्टी ने राज्यसभा में भी अपना दबदबा बनाए रखा, जब सितंबर में उसके उम्मीदवार सी. पी. राधाकृष्णन विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रत्याशी बी. सुदर्शन रेड्डी को हराकर उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इन जीतों ने भाजपा की राष्ट्रीय चुनावों में प्रभुत्वशाली स्थिति और राज्य स्तर पर उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को पुष्ट किया। साथ ही, यह भी स्पष्ट हुआ कि पिछले आम चुनावों के झटके के बावजूद मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर भाजपा की चुनावी और संस्थागत पकड़ बरकरार है।

पारदर्शिता को लेकर चिंताएँ

हालांकि, सत्ता के इस सुदृढ़ीकरण के साथ ही चुनावों के संचालन में पारदर्शिता की कमी को लेकर विपक्ष की चिंताएँ बढ़ी हैं। कांग्रेस पार्टी (आईएनसी) ने इस वर्ष अगस्त में कर्नाटक के बेंगलुरु सेंट्रल संसदीय क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा खंड में मतदाता सूचियों में विसंगतियों को लेकर चेतावनी दी। विपक्ष के नेता ने आरोप लगाया कि उन्हें डिजिटल मतदाता सूची तक पहुँच नहीं दी गई। लाखों भौतिक मतदाता सूचियों की छानबीन के बाद पार्टी ने डुप्लिकेट मतदाताओं और गायब पतों के मामले पाए, जिनका दावा है कि इससे 2024 में भाजपा को भारी बढ़त मिली। कांग्रेस ने इसे जनादेश की चोरी या “वोट चोरी” बताया और आरोप लगाया कि ऐसी स्थिति सैकड़ों अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी हो सकती है।

इसी दौरान बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पहले से ही चल रहा था। मसौदा सूची से लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद सवाल उठे कि विधानसभा चुनावों से महज तीन महीने पहले यह प्रक्रिया क्यों शुरू की गई, खासकर तब जब राज्य में बड़ी संख्या में गरीब प्रवासी मतदाता हैं जो पुनरीक्षण के समय मौजूद नहीं हो सके। इससे भी अधिक चिंता की बात यह रही कि इस ‘विशेष’ पुनरीक्षण में नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ जुटाने का बोझ मतदाताओं पर डाल दिया गया और नागरिकता तय करने का अधिकार बूथ स्तर अधिकारियों (बीएलओ) को सौंप दिया गया। शुरुआत में आधार को नागरिकता दस्तावेज़ के रूप में सूची से बाहर रखने पर आपत्ति जताई गई, जबकि मांगे गए अधिकांश अनिवार्य दस्तावेज़ हाशिए पर मौजूद मतदाताओं के लिए सामान्यतः सुलभ नहीं हैं। प्रक्रिया की जल्दबाज़ी और कई विसंगतियाँ सामने आई हैं। इसी तरह के पुनरीक्षण अन्य राज्यों में भी दोहराए गए हैं, जिन्हें सत्तारूढ़ दल मतदाता सूचियों की “शुद्धि” करार देता है। नवंबर और दिसंबर में पश्चिम बंगाल में भी SIR प्रक्रिया को लेकर ऐसी ही चिंताएँ उठी हैं।

क्या चुनाव आयोग निष्पक्ष है?

इन आरोपों ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिस पर सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच जारी टकराव में निष्पक्ष न रहने के आरोप लग रहे हैं। मतदान केंद्रों की कैमरा फुटेज जैसे अहम साक्ष्य चुनाव के 45 दिन बाद भी उपलब्ध नहीं कराए जाते। डिजिटल मतदाता सूचियों की अनुपलब्धता के कारण समय रहते शिकायत दर्ज कर पाना लगभग असंभव हो जाता है। यदि 2024 में चुनाव आयोग पर प्रधानमंत्री मोदी और सत्तारूढ़ दल के कथित सांप्रदायिक भाषणों पर कार्रवाई से बचने का आरोप लगा था, तो 2025 में उस पर बिहार चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और वित्तीय प्रलोभनों की अनदेखी करने का आरोप है। SIR की समय-सीमा का बीएलओ पर अत्यधिक दबाव कई दुखद मौतों और आत्महत्याओं का कारण बना, जबकि आयोग ने इन रिपोर्टों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर खारिज कर दिया।

क्या भारतीय लोकतंत्र कमजोर हुआ है?

इन सभी घटनाक्रमों ने उस लोकतांत्रिक अवसर को बाहर से ही बंद कर दिया है, जो 2024 में क्षणिक रूप से दिखाई दिया था। संस्थागत शक्ति, वित्तीय संसाधनों और मीडिया पर पकड़ के मिश्रण के चलते भाजपा अपने तीसरे कार्यकाल में मजबूत स्थिति में है। यद्यपि संचालनात्मक रूप से भारत के लोकतंत्र को हाल के वर्षों में ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ कहा गया है, लेकिन इसका वास्तविक पतन शायद सबसे अधिक उस अविश्वास में दिखता है जो चयनात्मक मतदाता पुनरीक्षण के नौकरशाही आदेश से पैदा हुआ है। बिना स्पष्ट ऑडिट और बिना सुधार का पर्याप्त समय दिए नाम काटे जाने से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की साख पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। आयोग की जल्दबाज़ी में देश के कमजोर वर्गों के नाम मतदाता सूची से हटने का जोखिम बढ़ गया है और मतदान की सार्वभौमिकता तथा उसके मूल्य को ठेस पहुँची है।

2026 में क्या होगा?

2026 में कई अहम चुनाव होने हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव शामिल हैं। इनमें से अधिकांश में भाजपा और मजबूत क्षेत्रीय दलों के बीच कड़ा मुकाबला होगा। तमिलनाडु में भाजपा ने एआईएडीएमके के साथ गठबंधन फिर से जीवित किया है और सभी आगामी चुनावों के लिए पार्टी इकाइयों के पुनर्गठन पर काम कर रही है। पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जिसे जीतना भाजपा के लिए एक प्रतीकात्मक उपलब्धि होगा।

इसके अलावा, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसे भाजपा के कुछ विवादास्पद विधेयक—जो फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष विचाराधीन हैं—आगामी वर्ष में संसद में पेश किए जा सकते हैं, जिससे भविष्य के चुनावों की समय-सीमा में बदलाव आ सकता है। जनगणना और परिसीमन की जटिल प्रक्रिया भी बहस का विषय बनने की संभावना है। संसद में सीटों का वर्तमान अनुपात बदला जा सकता है, जिससे भारत के कई दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी और परामर्श क्षमता प्रभावित होगी और देश की संघीय व्यवस्था की परीक्षा होगी।

(लेखिका जिंदल स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत, भारत में सहायक प्रोफेसर हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं। उनसे rsingh1@jgu.edu.in पर संपर्क किया जा सकता है।)

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