भारत का वैश्विक हेल्थटेक और बायो-इननोवेशन महाशक्ति के रूप में उदय: वैश्विक महत्व का विकास
आज, 2026 में, भारत अपने स्वास्थ्य-सेवा और तकनीकी विकास के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। जैव-प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल अवसंरचना और उद्यमिता के संगम ने अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं। वैज्ञानिक प्रतिभा, मजबूत डिजिटल अवसंरचना और कम लागत में नवाचार करने की क्षमता के बल पर भारत विश्व के सबसे महत्वपूर्ण हेल्थकेयर इनोवेशन केंद्रों में से एक बनने की स्थिति में है। हालांकि, इस नेतृत्व को बनाए रखने के लिए निरंतर निवेश, नियामकीय सुधार और रणनीतिक दृष्टि की आवश्यकता होगी।
पिछले एक दशक में भारत के आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन को निकट से देखने के आधार पर मेरा मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक रूप से निर्णायक विकासों में से एक भारत का वैश्विक हेल्थटेक और बायो-इननोवेशन महाशक्ति के रूप में उभरना है। भारत अब केवल “दुनिया की फार्मेसी” नहीं रहा, जो किफायती जेनेरिक दवाएं और टीके उपलब्ध कराता था। अब यह तेजी से जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य-सेवा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जीनोमिक्स, प्रिसिजन मेडिसिन और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म के क्षेत्र में नवाचार का केंद्र बन रहा है।
यह परिवर्तन संयोग से नहीं हुआ है। यह सरकार की सोच-समझकर बनाई गई नीतियों, अत्यधिक कुशल वैज्ञानिक कार्यबल, विश्व-स्तरीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और एक जीवंत उद्यमशील पारिस्थितिकी तंत्र का परिणाम है।
भारत की बायो-इकोनॉमी 2010 में लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 165 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई है (भारत सरकार और BIRAC के अनुमानों के अनुसार)। यह उल्लेखनीय विस्तार भारत की नवाचार क्षमता और वैश्विक स्वास्थ्य-सेवा पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
साथ ही, हेल्थटेक में भारत का भविष्य का नेतृत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वह शोध वित्तपोषण की कमी, नियामकीय सुधारों और स्वास्थ्य-सेवा तक असमान पहुंच जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का कितना प्रभावी समाधान कर पाता है।
जेनेरिक निर्माण से नवाचार नेतृत्व तक
भारत की वैश्विक स्वास्थ्य-यात्रा की शुरुआत जेनेरिक दवाओं के निर्माण से हुई थी। आज भारत मात्रा के आधार पर दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं आपूर्ति करता है और वैश्विक टीका मांग का लगभग 60 प्रतिशत पूरा करता है। इस निर्माण क्षमता ने भारत को पैमाना, तकनीकी विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता प्रदान की।
लेकिन वर्तमान परिवर्तन इससे कहीं अधिक गहरा है। भारत अब मौलिक अनुसंधान, जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार और उन्नत उपचारों का केंद्र बनता जा रहा है। जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स की संख्या 2015 में 1,000 से भी कम थी, जो 2024 तक बढ़कर 10,000 से अधिक हो गई है। यह वृद्धि नकल से नवाचार की ओर बदलाव को दर्शाती है।
बायोकॉन जैसी कंपनियों ने कैंसर और मधुमेह के लिए विश्व-स्तरीय बायोसिमिलर विकसित किए हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोविड-19 टीकों की सैकड़ों मिलियन खुराकें बनाकर वैश्विक स्तर पर पहचाना गया। भारत बायोटेक ने भारत का स्वदेशी कोविड-19 टीका विकसित किया, जिससे संकट की घड़ी में नवाचार करने की भारत की क्षमता सिद्ध हुई।
साथ ही, कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च, ड्रग डिस्कवरी सेवाएं और उन्नत बायोलॉजिक्स निर्माण का भी तेजी से विकास हुआ है। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार के वैश्विक केंद्र बन गए हैं।
रणनीतिक आधार के रूप में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना
हेल्थटेक में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना है। आधार डिजिटल पहचान, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के माध्यम से भारत ने दुनिया के सबसे उन्नत डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक बनाया है।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन एक परिवर्तनकारी पहल है। अब तक 50 करोड़ से अधिक डिजिटल हेल्थ आईडी बनाई जा चुकी हैं, जिनके माध्यम से लोग अपने मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रूप से संग्रहित और साझा कर सकते हैं। अस्पताल, प्रयोगशालाएं, चिकित्सक और बीमा प्रदाता तेजी से इस डिजिटल ढांचे से जुड़ रहे हैं।
यह डिजिटल आधार नवाचार के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियां बड़े डेटा सेट का विश्लेषण कर बीमारियों के पैटर्न पहचान सकती हैं, प्रकोपों की भविष्यवाणी कर सकती हैं और क्लिनिकल निर्णय-निर्माण में सुधार कर सकती हैं। टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म ग्रामीण और वंचित आबादी तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ा रहे हैं।
एआई टूल्स का विकास
सूचना प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में भारत की मजबूती एआई-आधारित हेल्थकेयर नवाचार में स्वाभाविक बढ़त प्रदान करती है। भारत में एआई का उपयोग पहले ही मेडिकल इमेजिंग, कैंसर पहचान, हृदय-रोग जोखिम अनुमान और रोग निगरानी में हो रहा है।
भारतीय स्टार्टअप और शोध संस्थान ऐसे एआई टूल विकसित कर रहे हैं जो एक्स-रे से टीबी की पहचान, डायबिटिक रेटिनोपैथी का निदान और शुरुआती चरण के कैंसर की भविष्यवाणी कर सकते हैं। इससे लागत घटती है और निदान की सटीकता बढ़ती है।
जीनोमिक्स और प्रिसिजन मेडिसिन भी एक प्रमुख नया क्षेत्र है। भारत की बड़ी और आनुवंशिक रूप से विविध आबादी लक्षित उपचार विकसित करने के लिए बहुमूल्य डेटा प्रदान करती है।
उदाहरण के लिए, कैंसर उपचार के लिए स्वदेशी CAR-T सेल थैरेपी भारत में वैश्विक लागत के एक छोटे हिस्से में विकसित की गई है, जिससे उन्नत कैंसर उपचार तक व्यापक पहुंच संभव हो सकेगी।
स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र और उद्यमशील गति
भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया के सबसे बड़े और गतिशील तंत्रों में से एक बन चुका है। हेल्थटेक स्टार्टअप्स स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी, डायग्नोस्टिक्स और ड्रग डिस्कवरी में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
ये स्टार्टअप टेलीमेडिसिन, वियरेबल हेल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस, डिजिटल थैरेप्यूटिक्स, एआई-आधारित निदान और क्लिनिकल रिसर्च तकनीकों जैसे क्षेत्रों में नवाचार कर रहे हैं।
स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और BIRAC के फंडिंग कार्यक्रमों जैसी पहलें अत्यंत सहायक रही हैं। देश भर में बायोटेक इनक्यूबेटर शोध विचारों को व्यावसायिक उत्पादों में बदलने में मदद कर रहे हैं।
भारत की लागत-संबंधी बढ़त भी बहुत महत्वपूर्ण है। अनुसंधान एवं विकास की लागत अमेरिका या यूरोप की तुलना में भारत में 30 से 60 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इससे भारत वैश्विक फार्मा कंपनियों और निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बनता है।
भारत की रणनीतिक बढ़त
भारत कई कारणों से वैश्विक स्वास्थ्य-सेवा में एक विशिष्ट रणनीतिक स्थान रखता है।
पहला, भारत कम लागत में नवाचार उपलब्ध कराता है।
दूसरा, भारत के पास विशाल निर्माण क्षमता है।
तीसरा, भारत के पास उच्च-कुशल वैज्ञानिक कार्यबल है।
चौथा, भारत की डिजिटल अवसंरचना बड़े पैमाने पर समाधान लागू करने में सक्षम है।
और अंततः, भारत की विशाल जनसंख्या अनुसंधान एवं विकास के लिए मूल्यवान क्लिनिकल डेटा प्रदान करती है।
नीति सक्षमकर्ता के रूप में सरकार
भारत सरकार ने इस परिवर्तन में केंद्रीय भूमिका निभाई है। बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC), नेशनल बायोफार्मा मिशन, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहलों ने भारत को जैव-प्रौद्योगिकी और हेल्थटेक में वैश्विक नेता बनाने की स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि दिखाई है।
संरचनात्मक चुनौतियां
इस प्रगति के बावजूद, भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत का अनुसंधान एवं विकास व्यय जीडीपी का केवल लगभग 0.7 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका और चीन में यह 2.5 प्रतिशत से अधिक है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य-सेवा अवसंरचना की असमानता भी एक बड़ी समस्या है। नियामकीय जटिलता नवाचार की गति को धीमा कर सकती है। साथ ही, प्रतिभा को देश में बनाए रखना और डेटा गोपनीयता तथा साइबर सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
मेडिकल टूरिज्म में अवसर
हेल्थटेक में भारत का उभार वैश्विक सहयोग के लिए बड़े अवसर प्रदान करता है। भारत एआई-आधारित ड्रग डिस्कवरी, प्रिसिजन मेडिसिन और क्लिनिकल रिसर्च का वैश्विक केंद्र बन सकता है। मेडिकल टूरिज्म भी एक बड़ा अवसर है, क्योंकि भारत कम लागत में उच्च-गुणवत्ता की चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है।
भविष्य के नेतृत्व के लिए रणनीतिक रोडमैप
भारत को अनुसंधान निवेश बढ़ाने, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूत करने, नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार करने और जीनोमिक्स, एआई तथा जैव-प्रौद्योगिकी में उन्नत अनुसंधान को प्राथमिकता देनी होगी।
वैश्विक स्वास्थ्य-नवाचार के भविष्य को आकार देना
आज, 2026 में, भारत अपने स्वास्थ्य और तकनीकी विकास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मुझे विश्वास है कि भारत न केवल अपनी स्वास्थ्य प्रणाली को बदलने में सक्षम है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य-नवाचार के भविष्य को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भारत का हेल्थटेक और बायो-इननोवेशन महाशक्ति के रूप में उभरना केवल एक राष्ट्रीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह वैश्विक महत्व का विकास है, जिससे दुनिया भर में अरबों लोगों को लाभ मिलेगा।
संदर्भ:
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भारत सरकार, जैव-प्रौद्योगिकी विभाग
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इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट 2024
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भारतीय ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) – बायोटेक्नोलॉजी उद्योग रिपोर्ट 2024
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नीति आयोग – न्यू इंडिया रणनीति एवं राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन दस्तावेज
(लेखक यूरोप और अमेरिका से दोहरी मास्टर डिग्री धारक हैं, पूर्व अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट बैंकर रह चुके हैं और वर्तमान में बेंगलुरु के एक विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय विपणन के विज़िटिंग प्रोफेसर हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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