हाल के वर्षों में, संचालनात्मक स्तर पर भारत के लोकतंत्र को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ (partly free) की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन इसका प्रत्यक्ष पतन शायद सबसे अधिक उस अविश्वास में दिखाई देता है, जो चयनात्मक मतदाता पुनरीक्षण के नौकरशाही आदेश से उत्पन्न हुआ है। इस प्रक्रिया में बिना किसी स्पष्ट ऑडिट और बिना नाम हटाने की व्याख्या या सुधार के लिए पर्याप्त समय दिए मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। ऐसे घटनाक्रमों के चलते दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दर्जा संकटग्रस्त प्रतीत होता है।
